जानिए इस कमाल की तकनीक की पूरी कहानी
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस वाई-फाई (WiFi) के बिना आज हमारी जिंदगी अधूरी सी लगती है, वह आखिर आया कहाँ से? अगर मैं आपसे पूछूँ कि इसका आविष्कार किस देश में हुआ था, तो शायद आपके दिमाग में सबसे पहले अमेरिका, जापान या चीन का नाम आएगा। लेकिन यकीन मानिए, सच आपको चौंका देगा।
आइए आज जानते हैं वाई-फाई के जन्म की वह दिलचस्प कहानी, जिसने पूरी दुनिया के कनेक्ट होने का तरीका ही बदल दिया।
आखिर कहाँ हुआ था वाई-फाई का जन्म?
वाई-फाई का आविष्कार किसी बड़े टेक हब में नहीं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया में हुआ था। जी हां, बिल्कुल सही पढ़ा आपने! इस क्रांतिकारी तकनीक को बनाने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया की एक मशहूर सरकारी रिसर्च संस्था CSIRO (Commonwealth Scientific and Industrial Research Organisation) और उनके वैज्ञानिकों की एक बेहद काबिल टीम को जाता है।
जब ढूंढ रहे थे ब्लैक होल और मिल गया वाई-फाई! (एक मजेदार किस्सा)
वाई-फाई का आविष्कार कोई सोची-समझी प्लानिंग का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह विज्ञान के इतिहास का एक बहुत ही खूबसूरत इत्तेफाक है। इसकी शुरुआत किसी कंप्यूटर या इंटरनेट लैब में नहीं, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान यानी रेडियो एस्ट्रोनॉमी (Radio Astronomy) की दुनिया में हुई थी।
अंतरिक्ष की गहराई से आपके स्मार्टफोन तक का सफर
बात 1990 के दशक की है। डॉ. जॉन ओ'सुलिवन और उनकी टीम CSIRO में अंतरिक्ष में मौजूद ब्लैक होल से आने वाली धुंधली रेडियो तरंगों (Radio Waves) को ढूंढने की कोशिश कर रही थी। इसके लिए वे एक बेहद जटिल गणितीय फॉर्मूले (Fast Fourier Transform) का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि सिग्नलों में आने वाली रुकावटों या शोर को साफ किया जा सके।
किस्मत देखिए, उन्हें ब्लैक होल तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने नोटिस किया कि जिस तकनीक से वे अंतरिक्ष के सिग्नलों को साफ कर रहे थे, उसका इस्तेमाल घर या ऑफिस के भीतर वायरलेस इंटरनेट चलाने के लिए भी किया जा सकता है।
दरअसल, उस वक्त वायरलेस इंटरनेट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बंद कमरों में रेडियो तरंगें दीवारों, सोफों और इंसानों से टकराकर बिखर जाती थीं, जिससे इंटरनेट की स्पीड और सिग्नल दोनों दम तोड़ देते थे। जॉन ओ'सुलिवन और उनकी टीम (जिसमें टेरी पर्सिवल, ग्राहम डेनियल्स, डाइट ओस्ट्री और जॉन डीन शामिल थे) ने इस मुश्किल का एक तोड़ निकाल लिया। उन्होंने डेटा को एक साथ कई छोटी-छोटी फ्रीक्वेंसी पर भेजने और उन्हें बिना किसी गड़बड़ी के आपस में जोड़ने का तरीका ढूंढ निकाला। बस, यहीं से वाई-फाई की नींव पड़ी।
वाई-फाई का पेटेंट और दुनिया भर में पहचान
जब वैज्ञानिकों को समझ आ गया कि उन्होंने कितनी बड़ी खोज कर ली है, तो इसके लीगल राइट्स (पेटेंट) सुरक्षित करने का काम शुरू हुआ:
पहला पेटेंट: CSIRO ने इस नायाब तकनीक के लिए 1992 में ऑस्ट्रेलिया में और 1996 में अमेरिका में पेटेंट रजिस्टर कराया।
दुनिया ने अपनाया: आगे चलकर यही ऑस्ट्रेलियाई तकनीक पूरी दुनिया के वाई-फाई स्टैंडर्ड (जैसे IEEE 802.11) का आधार बनी, जिसे आज हम सब इस्तेमाल करते हैं।
सम्मान की बौछार: इस बेमिसाल आविष्कार के लिए डॉ. जॉन ओ'सुलिवन को 2009 में ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा 'प्राइम मिनिस्टर प्राइज फॉर साइंस' और 2012 में 'यूरोपियन इन्वेंटर अवार्ड' दिया गया।
चलते-चलते
तो अगली बार जब आप अपने फोन या लैपटॉप को वाई-फाई से कनेक्ट करें, तो एक पल के लिए ऑस्ट्रेलिया के उन वैज्ञानिकों को थैंक यू जरूर कहिएगा। यह कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी जिंदगी में एक 'नाकामयाब' कोशिश (जैसे ब्लैक होल न मिल पाना) भी दुनिया को बदलने वाले एक सबसे बड़े और कामयाब आविष्कार का रास्ता खोल सकती है!



0 Comments