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द ग्रेट एमू वॉर: जब पक्षियों ने सेना को हरा दिया!

The Great Emu War: When birds defeated the army!

इतिहास के पन्नों में आपने कई महायुद्धों, राजाओं की लड़ाइयों और साम्राज्यवादी संघर्षों के बारे में पढ़ा होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक बार दुनिया में ऐसा "युद्ध" भी लड़ा गया था, जिसमें एक तरफ आधुनिक हथियारों और मशीन गनों से लैस इंसान थे, और दूसरी तरफ थे—हजारों विशालकाय पक्षी (एमू)? और सबसे हैरानी की बात यह है कि इस अजीबोगरीब जंग में पक्षियों ने इंसानी सेना को धूल चटा दी थी!

आइए जानते हैं इतिहास की इस सबसे अनोखी और दिलचस्प घटना—'द ग्रेट एमू वॉर' (1932) के बारे में।

पृष्ठभूमि: जब किसानों के लिए आफत बन गए एमू

बात 1930 के दशक की है, जब पूरी दुनिया महामंदी (Great Depression) के दौर से गुजर रही थी। ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी हिस्से (Western Australia) के किसानों पर इस मंदी की दोहरी मार पड़ रही थी। इसी दौरान, लगभग 20,000 एमू पक्षियों ने माइग्रेशन (प्रवास) करना शुरू किया और वे उपजाऊ कृषि भूमि की ओर बढ़ आए।

एमू (Emu) ऑस्ट्रेलिया का एक विशाल, न उड़ पाने वाला पक्षी है, जो दिखने में शुतुरमुर्ग (ostrich) जैसा होता है। ये पक्षी झुंड के झुंड खेतों में घुस जाते थे, वहां उगाई गई गेहूं की फसलों को चट कर जाते थे और खाने की तलाश में खेतों की बाड़ और फेंसिंग को तोड़कर तहस-नहस कर देते थे। किसानों की सालभर की मेहनत बर्बाद हो रही थी, जिससे वहां अकाल जैसे हालात पैदा होने लगे।

किसानों ने सरकार से गुहार लगाई कि इन पक्षियों से उनकी फसलें बचाई जाएं। चूंकि ये किसान पहले सैनिक रह चुके थे, इसलिए उन्होंने सरकार के सामने एक अनोखी मांग रखी—सेना और हथियारों की मदद!

युद्ध का ऐलान और सेना की तैनाती

किसानों के दबाव में आकर ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने मदद करने का फैसला किया। रक्षा मंत्री सर जॉर्ज पियर्स (Sir George Pearce) ने इसके लिए सेना भेजने की मंजूरी दे दी।

इस अनोखे "सैन्य अभियान" की कमान मेजर जी.पी. मeredith (Major G.P. Meredith) को सौंपी गई। उनके साथ सैनिकों की एक टुकड़ी थी, जो दो भारी लुईस मशीन गन (Lewis machine guns) और हजारों राउंड गोलियों से लैस थी। सेना का उद्देश्य था—किसानों की फसलों को बचाना और आक्रामक एमू पक्षियों के झुंड को या तो मार गिराना या भगाना। अक्टूबर 1932 में यह अजीबोगरीब अभियान शुरू हुआ।

जब हथियारों पर भारी पड़े फुर्तीले एमू

सैनिकों को लगा था कि मशीन गनों के सामने ये बेजुबान पक्षी टिक नहीं पाएंगे, लेकिन मैदान में उतरते ही सेना को अपनी गलती का अहसास हो गया:

  1. पक्षी रणनीतिकार निकले: एमू पक्षी बहुत ही फुर्तीले और चालाक साबित हुए। जैसे ही सैनिक उन पर हमला करने के लिए गाड़ी रोकते, वे छोटे-छोटे झुंडों में बंटकर चारों दिशाओं में भाग जाते थे।
  2. गोली खाने के बाद भी दौड़ना: मशीन गन से दागी गई गोलियां कई बार एमू पक्षियों को लगती थीं, लेकिन उनकी चमड़ी इतनी मोटी और शरीर की बनावट इतनी मजबूत थी कि वे गोली लगने के बावजूद तेजी से भाग निकलते थे। कई बार घायल पक्षी भी भागने में कामयाब हो जाते थे।
  3. मौसम और गाड़ियों की समस्या: जिस इलाके में यह अभियान चल रहा था, वहां का मौसम और पथरीली जमीन सेना के ट्रकों के अनुकूल नहीं थी। गाड़ियां समय पर एमू का पीछा नहीं कर पाती थीं।

कुछ ही हफ्तों में स्थिति यह हो गई कि सेना ने हजारों गोलियां खर्च कर दीं, लेकिन एमू पक्षियों का नुकसान नाममात्र का हुआ।

मीडिया की फजीहत और 'पक्षियों की जीत'

जब इस सैन्य अभियान की नाकामी की खबरें मीडिया में छपीं, तो ऑस्ट्रेलिया सरकार की देश-विदेश में भारी किरकिरी होने लगी। अखबारों ने इस पर तंज कसना शुरू कर दिया कि दुनिया की आधुनिक सेना एक पक्षी झुंड से युद्ध हार रही है। संसद में भी इस पर सवाल उठने लगे।

बढ़ते दबाव के चलते नवंबर 1932 के अंत में इस अभियान को पूरी तरह से बंद करना पड़ा और सेना को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। मीडिया ने इसे 'द ग्रेट एमू वॉर' का नाम दिया, जिसमें अंततः एमू पक्षी विजयी रहे।

आगे क्या हुआ?

सेना के पीछे हटने के बाद किसानों ने हार नहीं मानी और सरकार से दोबारा गुहार लगाई। इसके बाद सरकार ने सैनिकों को सीधे भेजने के बजाय किसानों को हथियार और आर्थिक सहायता देना शुरू किया, ताकि वे खुद अपनी फसलों की रक्षा कर सकें। बाद में एक बेहतर 'बाड़ प्रणाली' (fencing system) और इनाम योजना के जरिए एमू की आबादी पर नियंत्रण पाया गया।

निष्कर्ष

द ग्रेट एमू वॉर इतिहास के पन्नों में एक हास्यास्पद लेकिन दिलचस्प घटना के रूप में दर्ज है। यह इंसानी अहंकार और प्रकृति के बीच एक अनोखा उदाहरण है, जो यह याद दिलाता है कि कभी-कभी आधुनिक तकनीक और मशीन गनें भी प्रकृति की सरलता और जीवटता के आगे बेबस हो जाती हैं।

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